खोये दिलो की चित्रकारी “पुरानी तस्वीर” Purani Tashveer अपनी ख़ुशी को भूल चुके 40 पार दो शिल्पकारों की कहानी है। एक गुमशुदा और एक कार्यरत शिल्पकार फिर से कैसे सफल जीवन की पटकथा लिखते है। यह वास्तव में एक अद्भुत दृश्य है। अवश्य पढ़ें।
Purani Tashveer Love Story
सुबह की पहली किरण सरिता के चेहरे पर पड़ी, उसकी नींद टूटी। खिड़की से झाँकते सूरज की रोशनी ने उसके झुर्रियों वाले चेहरे पर एक नई चमक ला दी, जैसे कोई पुरानी तस्वीर (Purani Tashveer) फिर से रंगीन हो उठी हो। उसने पलंग से उठकर, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, जिसकी किनारी अब थोड़ी घिस चुकी थी।
रसोई से चाय की महक आ रही थी, नौकरानी रामकली का काम शुरू हो चुका था। चालीस की दहलीज पार कर चुकी सरिता, अब अपने जीवन के एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जहाँ अक्सर लोग ठहराव महसूस करते हैं। उसके बच्चे बड़े हो चुके थे, जो अपनी दुनिया में मस्त थे । पति को खोए हुए एक दशक बीत गया था। घर की दीवारें उसे अब काटने को दौड़ती थीं।
“भाभी जी, चाय तैयार है,” रामकली की आवाज आई, उसकी खनकती चूड़ियाँ साथ में बज उठीं।
सरिता ने एक लंबी साँस ली। “रामकली, बस आ रही हूँ।”
चाय की चुस्की लेते हुए उसने अख़बार उठाया। देश-दुनिया की खबरें पढ़ी , शहर की हलचल, अख़बार में छपे जोड़े, सब कुछ उसे बेमानी सा लगता था। उसकी आँखों ने पन्नों पर सरसरी निगाह डाली, फिर एक विज्ञापन पर ठहर गईं: ‘शिल्प मेला – हस्तशिल्प और कला का अद्भुत संगम।’
उसकी उंगलियाँ अनजाने में अख़बार पर फिरा गईं। उसे याद आया, बचपन में उसे भी चित्रकारी का शौक था। रंग-बिरंगे कैनवस, ब्रश की थिरकन, मनचाही आकृति बनाना, जिम्मेदारियों के बोझ तले, सब कुछ छूट गया था ।
कुछ दिनों बाद, सरिता ने खुद को शिल्प मेले के प्रवेश द्वार पर पाया। भीड़ भाड़, तरह-तरह की खुशबू, संगीत की धीमी धुन – सब कुछ उसे एक अलग दुनिया में ले जा रहा था। उसकी धड़कनें तेज हो गईं। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी, हर स्टॉल पर रुककर कलाकृतियों को निहारती। मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की नक्काशी, रंगीन कपड़े, हर तरफ जीवन का एक नया रूप था।
एक स्टॉल पर उसकी नजरें ठहर गईं। वहाँ पुरानी लकड़ियों को तराश कर मूर्तियाँ बनाई गई थीं। हर मूर्ति में एक कहानी थी, एक भावना थी। स्टॉल के पीछे एक व्यक्ति बैठा था, उम्र में सरिता से कुछ बड़ा, या शायद बराबर। उसके बाल सफेद थे, लेकिन आँखों में एक ऐसी चमक थी, जैसे किसी युवा कलाकार की। वह अपने हाथों से एक छोटी सी चिड़िया तराश रहा था। लकड़ी के बुरादे उसके कपड़ों पर फैले थे, पर उसे कोई परवाह नहीं थी।
सरिता ने धीरे से कहा, “ये बहुत सुंदर है,” उसकी आवाज काँप उठी।
उस व्यक्ति ने सिर उठाया, उसकी आँखों में एक पल को हैरानी थी, फिर एक हल्की मुस्कान फैल गई। “धन्यवाद बोला और कहा ये मेरी दुनिया है।” Read more love stories
सरिता ने कहा, “आपकी कला में एक गहराई है,” उसकी उंगलियाँ एक अधूरी मूर्ति पर घूम गईं। “जैसे हर टुकड़े में एक आत्मा बसी हो।”
“आप पहचानती हैं,” उसने कहा, उसकी आवाज धीमी और सौम्य थी। “बहुत कम लोग होते हैं जो इसे महसूस कर पाते हैं।”
“मैं सरिता,” उसने अपना परिचय दिया, उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास लौट आया।
उसने कहा, मै उमेश, अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी हथेली खुरदुरी थी, लकड़ी के काम से सख्त हुई।
उनका परिचय एक लंबी बातचीत में बदल गया। उमेश ने बताया कि वह अपनी कला को ही अपना जीवन मानता है। उसकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो गया था, और बच्चे विदेश में रहते थे। सरिता को लगा, जैसे वह अपनी ही कहानी सुन रही हो, पर एक अलग सिरे से।
“आपके पास भी कोई कला है क्या?” उमेश ने पूछा, उसकी आँखों में जिज्ञासा थी।
सरिता कुछ पल चुप रही, फिर बोली “कभी थी। रंग, कैनवास, पर सब छूट गया।”
उमेश ने कहा, “छूट गया होगा, पर खत्म नहीं हुआ होगा,” उसकी आँखों में एक अजीब सी प्रेरणा थी। “कला कभी मरती नहीं, बस सो जाती है। उसे जगाने की जरूरत होती है।”
मेला खत्म होने तक, वे दोनों घंटों बातें करते रहे। उमेश ने उसे अपने वर्कशॉप आने का न्योता दिया। सरिता ने सोचा भी नहीं था कि वह इतनी आसानी से किसी अजनबी के साथ इतनी सहज महसूस करेगी।
अगले हफ्ते, सरिता उमेश के वर्कशॉप पहुँची। शहर के शोर से दूर, एक शांत गली में, जहाँ पुरानी इमारतों से इतिहास की खुशबू आती थी। वर्कशॉप के अंदर लकड़ी की महक थी, औजारों की खनखनाहट। दीवार पर अधूरी मूर्तियाँ, मेज पर लकड़ी के टुकड़े बिखरे पड़े थे।
“आइए, सरिता जी,” उमेश ने मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया। उसने उसे एक छोटा सा स्टूल दिया। “आज हम कुछ नया करेंगे।”
उसने एक लकड़ी का टुकड़ा उठाया, जो किसी पेड़ की जड़ जैसा था। “इसमें आपको क्या दिखता है?”
सरिता ने उसे ध्यान से देखना शुरू किया । उसकी आँखों ने पहले सिर्फ एक बेतरतीब टुकड़ा देखा, फिर धीरे-धीरे उसमें एक आकार उभरने लगा। “एक उड़ता हुआ पक्षी,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी खुशी थी।
उमेश ने देखा सरिता की आँखों में चमक थी। उमेश ने सरिता से “अब इसे बाहर निकालना है।” उसने उसे एक छोटा सा औजार दिया। “पकड़िए।”
सरिता ने औजार पकड़ा, उसके हाथ काँप रहे थे। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वह फिर से कुछ ऐसा करेगी। उमेश ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा, उसे सही तरीके से औजार पकड़ना सिखाया। उसकी उंगलियों का स्पर्श सरिता को एक अजीब सी ऊर्जा से भर गया।
धीरे-धीरे, सरिता ने लकड़ी को तराशना शुरू किया। हर खुरचने के साथ, एक नया आकार उभरता, और उसके दिल में एक नया उत्साह जगता। उमेश उसके बगल में बैठा रहा, कभी कुछ बताता, कभी सिर्फ मुस्कुराता।
उसने कहा “आप बहुत अच्छा कर रही हैं” । “आपके हाथों में कला है।”
सरिता ने अपना काम रोका, उसकी आँखें नम हो गईं। “बहुत साल बाद ऐसा लगा, जैसे मैं कुछ कर रही हूँ, अपने लिए।”
उमेश ने कहा, “यही तो जीवन है,” उसकी आँखों में गहरी समझ थी। “अपने लिए जीना।”
उनका साथ अब नियमित हो गया। सरिता हर हफ्ते उमेश के वर्कशॉप जाती। कभी वे लकड़ी तराशते, कभी सिर्फ बातें करते। उमेश उसे अपनी बनाई हुई पुरानी मूर्तियाँ दिखाता, उनकी कहानियाँ सुनाता। सरिता उसे अपने बचपन की बातें बताती, अपने पति की यादें, बच्चों की शरारतें। दोनों ने एक-दूसरे के एकाकीपन को भरा, एक-दूसरे के घावों पर मरहम लगाया।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, और वर्कशॉप में धीमी रोशनी फैल रही थी, सरिता ने एक खूबसूरत चिड़िया की मूर्ति पूरी की। उसकी आँखों में चमक थी, होठों पर मुस्कान।
उसने कहा, “ये पूरी हो गई,” अपनी बनाई हुई चिड़िया को हाथ में उठाया।
उमेश ने कहा, बहुत खूब। ये उड़ने को तैयार है।
सरिता ने चिड़िया को देखा, फिर उमेश की तरफ देखा और बोली । “मुझे लगता है, शायद मैं भी उड़ने को तैयार हूँ।”
उमेश मुस्कुराया। “हम सब उड़ने को तैयार होते हैं, बस पंख पहचानने की देर होती है।”
उनकी दोस्ती धीरे-धीरे एक नए रिश्ते में बदल रही थी। एक दिन, उमेश ने उसे एक पेंटिंग दिखाई, जो उसने कई साल पहले बनाई थी। एक औरत, जिसके हाथ में रंग और ब्रश थे, उसकी आँखों में एक सपना था।
सरिता ने कहा, “ये… ये तो मैं हूँ,” उसकी आवाज़ में हैरानी थी।
“मैंने इसे आपको देखने के बाद बनाया था,” उमेश ने कहा, उसकी आँखों में एक अलग तरह की चमक थी। “आपकी आँखों में मैंने वो सपना देखा, जो शायद आप खुद भूल चुकी थीं।”
सरिता का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने कभी नहीं सोचा था कि इस उम्र में कोई उसे इस तरह देखेगा, इस तरह समझेगा।
“उमेश,” उसकी आवाज़ धीमी थी, काँप रही थी। “मैं… मैं नहीं जानती क्या कहूँ।”
“कुछ कहने की जरूरत नहीं है,” उमेश ने कहा, उसका हाथ धीरे से सरिता के हाथ पर आया। “बस महसूस कीजिए।”
उसका स्पर्श गर्म था और सुरक्षित भी। सरिता को लगा, जैसे बरसों बाद उसने फिर से किसी अपने का हाथ थामा हो। एक झुर्रियों भरा हाथ, पर उसमें इतनी ऊर्जा थी और अपार ममता।
सरिता ने कहा, “मुझे डर लगता है,” उसकी आँखें नम हो गईं। “इस उम्र में… लोग क्या कहेंगे?”
“लोग तो हमेशा कुछ कहते हैं,” उमेश ने कहा, उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी। “क्या हम उनकी परवाह करेंगे, या अपनी खुशी की?”
सरिता ने गहरी साँस ली और बोली “खुशी की।”
“तो फिर डर किस बात का?” उमेश मुस्कुराया। “जीवन एक बार मिलता है, सरिता। इसे पूरी तरह जीना चाहिए।”
उनका रिश्ता अब शहर में चर्चा का विषय बन गया था। कुछ लोग फुसफुसाते, कुछ लोग आश्चर्य करते और कुछ प्रशंसा करते। सरिता के बच्चे भी पहले थोड़े हैरान हुए, फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी माँ की खुशी को समझा।
एक दिन, सरिता की बेटी, नीता, घर आई। उसने अपनी माँ को पेंटिंग करते देखा। सरिता के चेहरे पर एक चमक थी, जो उसने बरसों से नहीं देखी थी।
नीता ने कहा, “माँ, आप बहुत खुश लग रही हैं,” उसकी आँखों में प्यार था।
“हाँ, बेटा,” सरिता मुस्कुरायी। “बहुत खुश।”
“और उमेश अंकल?” नीता ने थोड़ा शरमाते हुए पूछा।
सरिता हँस पड़ी। “उमेश ने मुझे फिर से जीना सिखाया है, नीता। उन्होंने मुझे बताया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती।”
नीता ने अपनी माँ को गले लगा लिया। “मैं आपके लिए खुश हूँ, माँ।”
सरिता और उमेश ने मिलकर एक नई प्रदर्शनी की योजना बनाई। इस बार, सिर्फ उमेश की कला नहीं थी, बल्कि सरिता की पेंटिंग्स भी थीं। उनकी कलाकृतियों में, उनके रिश्ते की कहानी थी – पुरानी लकड़ियों में नया जीवन, कैनवस पर बिखरे रंग, जो एक नई शुरुआत का प्रतीक थे।
प्रदर्शनी के उद्घाटन के दिन, वर्कशॉप में भीड़ उमड़ पड़ी। सरिता और उमेश एक साथ खड़े थे। उनकी आँखों में चमक थी, उनके चेहरों पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान।
सरिता की पेंटिंग को निहारते हुए एक महिला ने कहा, सरिता जी , “आपकी कला में एक नयापन है,” “इसमें एक खुशी है, एक आशा है।”
सरिता मुस्कुरायी और बोली “यह जीवन की कला है” । यह बताती है कि हर उम्र में सपने देखे जा सकते हैं, और उन्हें पूरा भी किया जा सकता है।
उमेश ने सरिता की तरफ देखा। उसकी आँखों में प्यार था, सम्मान था। उसने धीरे से सरिता का हाथ दबाया।
उमेश बोला, मै, हमेशा से यही तो कहता था । “कला कभी मरती नहीं, बस सो जाती है। इसे जगाने की जरुरत होती है।”
सरिता ने हँसते हुए जवाब दिया। “और कभी-कभी, उसे जगाने के लिए एक खास व्यक्ति की जरूरत होती है।”
उनकी हँसी वर्कशॉप में गूँज उठी, लकड़ी की महक और रंगों की खुशबू के साथ घुलमिल गई। यह सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं थी, यह एक नई शुरुआत थी, एक अधेड़ उम्र के प्यार की कहानी, जिसने दिखाया कि जीवन का हर पड़ाव एक नई यात्रा हो सकती है, अगर आप उसे खुली बाहों से स्वीकार करें। सरिता को लगा, जैसे उसकी आत्मा ने फिर से उड़ान भरी हो, उन रंगों और लकड़ियों के बीच और उमेश के साथ। उसकी ज़िंदगी की पुरानी किताब में एक नया, रंगीन अध्याय जुड़ चुका था। दो अलग अलग बिखरे दिल प्यार से एक हो चुके थे और दोनों परिवार खुश थे ।

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